बुलेटिन इंडिया, संवाददाता।
जगदीश्वर चतुर्वेदी की कलम से ✒️
यदि सिर्फ हिन्दुओं के हितों के लिहाज से ही आरएसएस की भूमिका का मूल्यांकन करें ,भाजपा सरकारों के कदमों का विश्लेषण करें तो पाएंगे हिन्दुओं के जीवन को रौरव नरक बनाने में संघ परिवार और उसके संगठनों की केन्द्रीय भूमिका है।अन्य चीजों के अलावा हिन्दुओं को बड़े पैमाने पर भ्रष्ट बनाने में बड़ी भूमिका निभायी है।हम कुछ देर के लिए भूल जाएं कि भारत बहुधार्मिक-बहुजातीय देश है।हम सिर्फ हिन्दुओं के हितरक्षक के रूप में उनके दावे की व्यापक पड़ताल करें कि उनकी हिन्दूसमाज के प्रति सकारात्मक भूमिका रही है या नकारात्मक भूमिका रही है ?
संघ का सबसे बड़ा योगदान है कि उसने हिन्दुओं में अंधविश्वास और धार्मिक कर्मकांड को जमकर प्रचारित करके हिन्दुओं का सबसे बड़ा नुकसान किया है।
दूसरा ,नौकरशाही और सैन्यबलों-अर्द्ध सैन्यबलों में प्रतिगामी विचारों का जमकर प्रचार करके सामाजिक विकास की गति को नकारात्मक रूप में प्रभावित किया है।
तीसरा, वैज्ञानिक चेतना का विरोध करके पोंगापंथ को हिन्दुओं की पहचान दी। 21वीं सदी में पोंगापंथ की पहचान के साथ हिन्दुओं को जोड़कर उसने सबसे बड़ा सामाजिक अहित किया है।
शिक्षकों को देखें तो सहज ही अकादमिक गुणवत्ता की पोल खुल जाएगी। हमारे लिए यह चिन्ता की बात है आरएसएस जैसा विशाल संगठन 10 बेहतरीन विद्वान पैदा नहीं कर पाया, इतनी दरिद्र दक्षिणपंथी राजनीति तो किसी भी देश में नहीं है।
विगत सौ साल में असहिष्णुता पर इतना हंगामा हुआ लेकिन आरएसएस अपने 10 उच्चकोटि के हिमायती मीडिया में पेश नहीं कर पाया, यदि यही उसकी अकादमिक क्षमता है तो फिर तो भारत के मालिक कूपमंडूक ही हो सकते हैं !!
उसके प्रचारतंत्र की धुरी हैं औसत दर्जे के अनुगामी पत्रकार-लेखक। इनमें संघी विचारधारा के लठैत पत्रकारों की कलम की तथाकथित धार को देखकर चारण समाज भी लज्जित महसूस करता है, इस तरह के पत्रकार ठीक से यदि चारण-भाट का काम भी करते तो ठीक रहता लेकिन वे तो आधे पत्रकार-आधे संघी हैं। इस तरह के भाड़े के टट्टुओं के बल पर भारत कैसे महान देश बनेगा ? हम तो यही कहेंगे भाड़े के टट्टुओं से जनता को भ्रमित कर सकते है,घायल कर सकते हैं,लेकिन देश की जनता की आर्थिक उन्नति नहीं कर सकते। दिलो-दिमाग पर शासन नहीं कर सकते। संघी पत्रकार -शिक्षक बुनियादी तौर पर दीमक हैं।
आरएसएस वाले यह नहीं कह सकते कि उसे देश में शासन चलाने का मौका नहीं मिला,सच यह है कई राज्यों में दसियों साल से वे शासन चला रहे हैं,केन्द्र में 11 साल मोदी के और छह साल अटल के शासन के रहे हैं,अपार बहुमत है,लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान इन लोगों ने जनता,भारत और शिक्षा का किया है। शिक्षा का कोई उच्चकोटि का मानक ये बना नहीं पाए,एक भी वि वि ऐसा नहीं बना पाए जिसे शिक्षा में उच्चकोटि का स्थान मिले,इससे हम समझ सकते हैं कि आरएसएस किस तरह का जनविरोधी संगठन है।
जो संगठन शिक्षा में श्रेष्ठत्व का विरोधी हो,विचारों की स्वतंत्रता का विरोधी हो,ज्ञानियों का विरोधी हो,वह देश का विकास किस दिशा में करेगा इसका सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।
RSS के संघी नायक हेडगेवार, दीनदयाल उपाध्याय, गोलवल्कर, देवरस, नानाजी देशमुख, मोहन भागवत आदि के विचारों से भारत में साहित्य, कला, संस्कृति, समाजविज्ञान, विज्ञान आदि क्षेत्रों में कभी कोई नामी बुद्धिजीवी पैदा नहीं हुआ, इससे पता चलता है कि आरएसएस कितना दरिद्र संगठन है, इसके विपरीत कांग्रेस, कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट आदि के नायकों से प्रभावित बुद्धिजीवियों की देश में लंबी परंपरा रही है। इसके विपरीत आरएसएस ने ढपोरशंख बुद्धिजीवी जरूर पैदा किए हैं, जिनके पास डिग्री है, पद है, लेकिन बौद्धिक क्षमता नहीं है। हां, दलबदलू बुद्धिजीवियों की भीड़ जुटाने में संघ सफल रहा है।
आरएसएस हिन्दुओं की रक्षा की आड़ में कारपोरेट हितों को समाज में विस्तार देने का काम करता रहा है। उसकी प्राथमिकता में हिन्दू नहीं हैं। उसकी प्राथमिकता हैं कारपोरेट घराने, हिन्दू राष्ट्र तो इसका मुखौटा है।
यह शुद्ध कारपोरेट हित साधक और कारपोरेट राजनीति प्रचारक संगठन है। इसके लक्ष्य है राष्ट्र-राज्य का विखंडन और उसके संसाधनों को कारपोरेट घरानों के हवाले करना। इसकी कारपोरेट घरानों के हितों के अलावा किसी के प्रति निष्ठा नहीं है।बहुराष्ट्रीय कंपनियों का यह सबसे प्यारा संगठन है। पोंगापंथ और अंधविश्वास इसकी विचारधारा है।अब आप ही सोचें कि किस तरह इससे महान राष्ट्र बनेगा ?
स्रोत – सच्ची बातें।
(नोट: यह आर्टिकल जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के फेसबुक वाल से लिया गया है। श्री चतुर्वेदी कलकत्ता विश्वविद्यालय कोलकाता में हिंदी विभाग के प्रोफेसर रह चुके हैं।)