विस्थापितों के अधिकार और प्रशासन की संवेदनहीनता: बोकारो में 3 अप्रैल 2025 का काला दिवस

बुलेटिन इंडिया।

रीना एस. पॉल की कलम से ✒️ 

बोकारो स्टील सिटी के इतिहास में 3 अप्रैल 2025 का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज किया जाएगा। इस दिन एक विस्थापित युवक प्रेम कुमार महतो को नियोजन की मांग के बदले अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। यह घटना न केवल बोकारो बल्कि पूरे देश के लिए प्रशासनिक संवेदनहीनता और औद्योगिक विकास की क्रूर सच्चाई को उजागर करती है। वर्षों से विस्थापितों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया है, लेकिन बीएसएल (बोकारो स्टील लिमिटेड) प्रबंधन ने बार-बार उनकी उम्मीदों को तोड़ा है। प्रेम महतो की मृत्यु इसी अन्याय और उपेक्षा का प्रत्यक्ष परिणाम है।

 

शांतिपूर्ण आंदोलन और प्रशासन की बर्बरता

बीएसएल के विस्थापित लंबे समय से अपने अधिकारों और नियोजन की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। वे अपनी जमीन और संसाधनों को विकास के लिए समर्पित कर चुके हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें उपेक्षा और शोषण ही मिला है। 3 अप्रैल को भी विस्थापित अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने इसे कुचलने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया।

 

मुख्य महाप्रबंधक (एचआर) हरी मोहन झा के निर्देश पर सीआईएसएफ के जवानों ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। इस बर्बर लाठीचार्ज में प्रेम कुमार महतो को सिर पर गंभीर चोट लगी, जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई। यह घटना दर्शाती है कि सरकार और औद्योगिक प्रशासन किस हद तक अमानवीय हो सकते हैं, जब बात विस्थापितों और गरीबों के अधिकारों की आती है।

न्याय की मांग और प्रशासन की मंशा

घटना के बाद बीएसएल प्रबंधन मृतक के परिजनों को नियोजन और मुआवजा देने की बात कर रहा है। लेकिन यह केवल प्रशासनिक खानापूर्ति लगती है, क्योंकि नियोजन और मुआवजे की मांग तो वर्षों से उठाई जा रही थी। यदि प्रशासन सच में विस्थापितों की सुध लेता, तो प्रेम कुमार महतो को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती।

 

इस घटना ने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है: क्या विस्थापितों को नियोजन प्राप्त करने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी होगी? यह प्रश्न न केवल बोकारो के विस्थापितों के लिए, बल्कि पूरे देश के उन लाखों विस्थापित परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो विकास के नाम पर अपने घर, जमीन और अस्तित्व को खो चुके हैं।

 

विस्थापन: विकास का अभिशाप?

औद्योगिकीकरण और विकास के नाम पर देश के कई हिस्सों में विस्थापन की समस्या दशकों से बनी हुई है। बोकारो स्टील प्लांट की स्थापना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा थी, जिसके लिए हजारों परिवारों को अपनी जमीन से बेदखल किया गया। विस्थापन के बाद इन्हें नियोजन और पुनर्वास का आश्वासन दिया गया था, लेकिन आज तक अधिकांश विस्थापित अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अपने प्राणों की आहुति दे रहे हैं।

 

सरकार और औद्योगिक घराने अपने फायदे के लिए विस्थापितों की पीड़ा को अनदेखा करते हैं। उन्हें सिर्फ सस्ते श्रमिकों के रूप में देखा जाता है, न कि उन लोगों के रूप में जिन्होंने अपनी भूमि और जीवन को बलिदान कर दिया।

 

जिला प्रशासन ने जारी किया प्रेस रिलीज 

‌इधर घटना के बाद जिला उपायुक्त ने संज्ञान लेते हुए देर रात अधिकारियों के साथ कार्यालय में बैठक की। बैठक के पश्चात प्रेस रिलीज जारी करते हुए बताया कि मुख्य महाप्रबंधक बीएसएल प्लांट हरि मोहन झा को गिरफ्तार किया। तथा विस्थापित अप्रेंटिस संघ की सभी मांगों को बीएसएल प्रबंधन ने मान लिया है।

जिसमें मुख्य निम्न बातें शामिल हैं।

  • ट्रेनिंग पूरा कर चुके सभी विस्थापित अप्रेंटिस प्रशिक्षुओं को बीएसएल प्रबंधन 21 दिनों में पद सृजित कर तीन माह के अंदर उन्हें नियुक्ति देगा। वहीं, प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कोचिंग की सुविधा उपलब्ध कराएगा।
  • मृतक के परिजनों को (रु.) 20 लाख रमुआवजा एवं परिवार के एक सदस्य को नियोजन देना बीएसएल प्रबंधन ने किया स्विकार।
  • बीएसएल प्रबंधन घायलों को बीजीएच में मुफ्त उपचार एवं (रु.) 10,000/- मुआवजा देने को राजी।
  • वहीं, अन्य मांगों के लिए बीएसएल विस्थापितों के साथ प्रति माह 15 तारीख को जिला नियोजन पदाधिकारी एवं अपर समाहर्ता की उपस्थिति में बैठक कर अनुश्रवण करेंगे।

उपरोक्त सभी बातों को लेकर उपायुक्त ने अपर समाहर्ता एवं अनुमंडल पदाधिकारी चास को प्रत्येक माह अनुश्रवण कर अनुपालन सुनिश्चित कराने को कहा है।

 

बोकारो की यह घटना विकास बनाम मानवाधिकार की बहस को फिर से जीवंत कर देती है। प्रेम कुमार महतो की मृत्यु सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि यह उस संवेदनहीन व्यवस्था का प्रतीक है जो गरीबों और विस्थापितों की आवाज़ को अनसुना कर देती है। यदि प्रशासन और सरकारें इसी राह पर चलती रहीं, तो देश में विस्थापितों और श्रमिकों के बीच असंतोष और विद्रोह की भावना और अधिक गहराएगी।

 

अब समय आ गया है कि सरकार और औद्योगिक घराने अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाएं। विकास तभी सार्थक होगा जब उसमें हर वर्ग की भागीदारी होगी और कोई भी समुदाय अपने अधिकारों से वंचित नहीं रहेगा। बोकारो के विस्थापितों का संघर्ष केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे देश के शोषितों और वंचितों का संघर्ष है। प्रेम कुमार महतो की शहादत व्यर्थ न जाए, इसके लिए समाज और प्रशासन दोनों को संवेदनशीलता के साथ ठोस कदम उठाने होंगे।

 

By admin

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